आदिवासी क्षेत्र की दुर्लभ जड़ी-बूटियां इस बार आकर्षण का केंद्र

नई दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे 39वें अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में पहली बार देश के आदिवासी इलाकों की दुर्लभ जड़ी बूटियां देखने को मिल रही हैं। मध्यप्रदेश के पंचमढ़ी इलाके से आदिवासी समुदाय के लोग विभिन्न तरह की जड़ी बूटियां लेकर मेले में पहुंचे हैं। इनके सेवन से गैर संचारी रोगों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। वहीं मेले में सरस और हुनर हाट भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां सिल्क की साड़ियों व घर में रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं पर की गई नक्काशी दर्शकों को आकर्षित कर रही है।

आदिवासी समुदाय का मानना है कि भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में विलुप्त होती आदिकालीन की जड़ी बूटियों में किसी भी रोग को जड़ से खत्म करने की अद्भुत क्षमता है। आदिवासी क्षेत्र से आने वाली रीना देवी का कहना है कि जीवनशैली से जुड़े रोगों पर नियंत्रण के लिए यह जड़ी बूटियां बेहद कारगर साबित हो सकती हैं।

उधर त्रिपुरा के पवेलियन के अधिकारी टिकू राय ने बताया कि त्रिपुरा में हजारों परिवार रबड़ के पेड़ों पर निर्भर हैं। किसान 40 वर्ष तक पेड़ के दूध से रबड़ बनाता है और इसके बाद इस पेड़ से फर्नीचर बना लेता है जिसकी कीमत अन्य के मुकाबले काफी ज्यादा होती है। पेड़ की टहनियों से बने सुंदर खिलौने, चिड़िया सहित अन्य सामान बच्चों में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। 

मेले में झारखंड का भी पवेलियन है जहां बांस के उद्योग के बारे में लोगों को बताया जा रहा है। झारखंड में रहने वाले आदिवासियों के लिए पहाड़ी बांस रोजगार का साधन बन गया है। कारीगरों के अनुसार बांस को लेकर बनाए गए नए नियमों के बाद इस दिशा में निवेश बढ़ा है। पहले लोग बांस की खेती करने से दूर भागते थे लेकिन नए नियम बनने के बाद किसान बांस की खेती के लिए आगे आए हैं। 

आईटीपीओ- ट्रेड फेयर 2019, दिल्ली के लिए आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया-ग्रामीण आवाज की रिपोर्ट