बिलुप्त होती जा रही है सबरों (आदिम जनजाति)

झराखण्ड बयूरो : रणधीर कुमार के साथ , राजेन्द्र प्रसाद वर्मा की रिपोर्ट : सबरों (आदिम) जनजाति) की स्थिति इन दिनों बहुत दयनीय है. इस ओर सरकार ,प्रशासन को ध्यान देने की जरूरत है संबंधित जानकारी पीयूसीएल के एक कार्यकर्ता द्वारा प्राप्त हुआ

शनिवार PUCL की एक टीम खड़ीयाबस्ती, लुपुनडीह, प्रखंड निमडीह, जिला सरायकेला खरसवां पहुँची और वहां बसे 31 सबर आदिम जनजाति के परिवारों की स्थिति की जाँच की। जाँच के दौरान यह जानकारी मिली कि सबर आदिम जनजाति के उक्त परिवारों को राज्य सरकार की पहल पर सन् 2000 में बसाया गया था।

सरकार की तरफ से इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत सभी 31परिवारों को जंगल से लाकर दलमा पहाड़ के नीचे खाड़ीयाबस्ती में बसाया गया। जन विकास केन्द्र द्वारा सरकार से प्रति परिवार एक एक आवास मिले 20000 रूपये में अपनी ओर से 11000 रूपये और मिला कर उनके लिए 31000 में घर बना दिया गया। शौचालयों की भी व्यवस्था की गयी। शुरुआती दिनों में ये सबर कृषि कार्य में भी लगे थे। रोजगार के अभाव में ये सबर अपनी जिंदगी का नियोजन नहीं कर सके।

इन सालों में 11 परिवारों ने उक्त जगह को छोड़ दिया बाकी 20 परिवारों की जिंदगी दयनीय है। उनके सारे घर ढह गये हैं। शौचालय इस्तेमाल करने लायक नहीं हैं। एक विधालय है। पाचंवी तक पढ़ाई होती है। दो पारा शिक्षक हैं। एक आंगनवाड़ी केन्द्र है। बारिश के इन दिनों वहीं उनका सहारा है। सरकार के पास इस लुप्त प्रजाति को बचाने के लिए कोई योजना नहीं है।

पिछले 17 सालों में कोई अनुदान नहीं दिया गया है, खेती समाप्त हो गयी है, पूरा इलाका जंगल में है इस कारण आजकल यंहा साँपों का डेरा हो गया है। कुपोषण की शिकार यह जनजाति सरकारी उपेक्षा का दंश झेलते हुए बिलुप्त होने के लिए अभिशप्त है। 2008 से 2017 तक सरकार को सौंपे गये दर्जनों स्मारपत्रों के बावजूद सरकार की योय से कोई पहल नही की गई पीयुसीएल इस मामले को उच्च न्यायालय में ले जाने की बात कर रही है

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